क्या कोई व्यक्ति दूध की रखवाली बिल्ली को देना चाहता है? सभी का जवाब ना में होगा। लेकिन शायद राजस्थान सरकार और ऊर्जा विभाग बिल्ली से ही दूध की रखवाली करवाने पर आमादा है। मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड से जुड़े भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर है।

विभिन्न जांच रिपोर्ट में भ्रष्टाचार व घोटाले साबित होने एवं मीडिया में उजागर होने के बावजूद राज्य सरकार और ऊर्जा विभाग के आला अफसर अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन पर ज्यादा ही  मेहरबान है। मेहरबानी भी इतनी कि तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के तथ्यों के बावजूद राजस्थान की महत्वाकांक्षी परियोजना दो सौ मेगावाट रुफटॉप सोलर प्लांट के कार्यों का जिम्मा अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन को दिया गया है। इस योजना में करीब दस हजार करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। प्रदेश की पांचों कंपनियों में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं को लेकर गत तीन साल से मीडिया की सुर्खियों में रहा अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन को इतनी महत्वपूर्ण परियोजना देना कई तरह के सवाल खड़ा कर रहा है।

भ्रष्टाचार में डूबे अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन की कार्यशैली से दो सौ मेगावाट रुफटॉफ सोलर प्लांट योजना का भी वैसा ही हश्र होने का अंदेशा जताया जा रहा है कि जैसा सौभाग्य और कुसुम योजना में हुआ है। अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन पर ठेका कंपनियों को नियम विरुद्ध तरीके से फायदा पहुंचाने और डिस्कॉम के एमडी समेत अन्य अभियंताओं के ठेका कंपनियों में नजदीकी रिश्तेदारों की हिस्सेदारी होने के मामले उजागर हो चुके हैं। इसके बावजूद दस हजार करोड़ रुपये की योजना विवादों में चल रही अजमेर डिस्कॉम को देने से पांचों कंपनियों में यह चर्चा खूब है कि सरकार ने आंख बंद करके एक बिल्ली को दूध की रखवाली दे दी है।  यह पहली बार है रुपटॉफ सोलर प्लांट के लिए सरकार ने अजमेर डिस्कॉम को जिम्मेदारी है, जबकि इससे पहले राजस्थान रिन्यूबल एनर्जी कार्पोरेशन के माध्यम से ये कार्य किए जाते रहे हैं।

9 फरवरी को खुलेगा टेण्डर


करीब दस हजार करोड़ रुपये की दो सौ मेगावाट की रुपटॉफ सोलर प्लांट योजना के कार्यों का जिम्मा अजमेर डिस्कॉम को देने के बाद इसकी टेण्डर प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। पांच जनवरी को बीड शुरु हो गई है। 9 फरवरी को 200 मेगावाट रुफटॉफ सोलर प्लांट का टेण्डर निकाला जाएगा। पहले यह 25 जनवरी को खुलने वाला था, लेकिन बताया जाता है कि चहेती फर्म को कथित तौर पर फायदा देने के लिए तारीख को बढ़ाकर 9 फरवरी कर दी गई है। डिस्कॉम में यह भी चर्चा है कि यह टेण्डर भी गुजरात से जुड़ी कंपनियों को ही मिलेगा। इन कंपनियों में अजमेर डिस्कॉम के आला अधिकारी के बेटों, बहू और बहन की हिस्सेदारी है और इस हिस्सेदारी फर्म के जरिये गत तीन साल के दौरान अरबों रुपयों के कार्य किए गए हैं। इन कार्यों में ही फर्मों की वित्तीय अनियमितता और फर्जीवाड़े सामने आ चुके हैं। सरकार की दो कमेटियों ने जांच भी की है।

सवाल जो मांगते हैं जवाब ……..


– दस हजार करोड़ रुपये के 200 मेगावाट की रुपटॉफ सोलर प्लांट योजना के तहत कार्य पूरे प्रदेश में होने हैं। फिर अजमेर डिस्कॉम को ही यह कार्य का जिम्मा क्यों दिया और बाकी दोनों कंपनियों को क्यों वंचित रखा गया है?
– प्रदेश में जयपुर, जोधपुर, अजमेर समेत पांच बिजली कंपनियां है। आखिर अजमेर डिस्कॉम ने सोलर प्लांट या अन्य योजनाओं में ऐसा कौनसा उल्लेखनीय कार्य कर दिया, जिसके चलते अजमेर डिस्कॉम को इतनी बड़ी योजना का जिम्मा सौंपा गया?
– अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन पर सौभाग्य, कुसुम, सोलर प्लांट, डिफेक्टिव मीटर्स को राइट ऑफ करने जैसे करोडों रुपयों के घोटाले व वित्तीय अनियमितताएं उजागर हो चुकी है। जांच रिपोर्ट में भी यह साबित हो चुका है। बावजूद इसके प्रदेश की इतनी बड़ी योजना का जिम्मा भ्रष्टाचार के चलते विवादों में रही अजमेर डिस्कॉम को क्यों दिया गया?
– अजमेर डिस्कॉम के आला अधिकारी पर ठेका कंपनियों व फर्मों को नाजायज फायदा देने, कंपनियों में नजदीकी रिश्तेदारों की हिस्सेदारी और वित्तीय अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि आला अधिकारी की कंपनियों को कथित फायदा देने के लिए अजमेर डिस्कॉम प्रबंधन को दो सौ मेगावाट रुपटॉफ सोलर प्लांट कार्य का जिम्मा दिया गया है?

अजमेर डिस्कॉम के चर्चित घोटाले


अजमेर डिस्कॉम में कई चर्चित घोटाले सामने आ चुके हैं। जिनमें प्रमुख रुप से किसानों को आर्थिक रुप से मजबूत करने वाली कुसुम योजना में भारी वित्तीय अनियमितता की गई है। इस कार्य की निविदा में 4692 सोलर प्लांट के लिए करीब 96 करोड़ रुपये की लागत सामने आई, लेकिन आला अधिकारी ने इसे बढ़ाकर 117 करोड़ रुपये का करके चहेती कंपनी को उपकृत किया और सरकारी कोष को करीब 21 करोड़ रुपये की चपत लगाई। इसी तरह तेरह हजार से अधिक डिफेक्टिव मीटर्स को बदलने के बजाय इन्हें जीरो करके फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाकर तीन करोड़ की चपत सरकारी कोष को लगाई।

चहेती फर्म को दो-दो कार्यादेश तक दे दिए। फर्मों ने स्वयं काम करने के बजाय दूसरों को सबलेट कर दिया। इसी तरह सौभाग्य योजना में सोलर सिस्टम खरीद में करोड़ों रुपयों की अनियमितता सामने आ चुकी है। अजमेर डिस्कॉम ने 35,100 रुपए प्रति सिस्टम में खरीद की, जबकि जोधपुर डिस्कॉम ने 28 हजार रुपये प्रति सिस्टम में खरीद की थी। न्यूनतम दर पर सोलर सिस्टम खरीदना तय था, लेकिन सात हजार रुपये अधिक प्रति सिस्टम अधिक लेकर करोड़ों रुपयों की गड़बड़ी की। करीब 83 हजार घरों में ये सोलर सिस्टम लगे। बिना बिजली तार लगे ही एक फर्म को पांच करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान का मामला भी पकड़ जा चुका है। ऐसे कई मामले राज्य सरकार और ऊर्जा विभाग के संज्ञान में आ चुके हैं। सरकार के निर्देश पर गठित दो जांच कमेटियों ने हाल ही अपनी जांच रिपोर्ट भी है।

ग्रीन एनर्जी के लिए रुपटॉफ सोलर प्लांट योजना

ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने रुपटॉफ सोलर प्लांट योजना चला रखी है। इसमें अलग-अलग किलोवाट के हिसाब से दस से चालीस फीसदी तक सब्सिड़ी दी जा रही है। सब्सिडी की राशि का भुगतान भारत सरकार करती है। गैर सब्सिडी की राशि उपभोक्ता को देनी होती है। पच्चीस साल तक उपभोक्ता व कंपनी के बीच एमओयू होता है, जिसमें किसी भी तरह की टूट-फूट को ठीक करने, रखरखाव व बिजली बिक्री की जिम्मेदारी कंपनी की होती है।  सोलर सिस्टम लगाने वाली कंपनी व फर्मों का चयन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।